बीबीएमबी बिजली बकाया विवाद: हिमाचल को 11,973 मिलियन यूनिट बिजली मिलने का रास्ता साफ, बिंदल ने धूमल सरकार और केंद्र को दिया श्रेय
शिमला। बीबीएमबी की जलविद्युत परियोजनाओं में हिमाचल प्रदेश की 7.19 प्रतिशत हिस्सेदारी को लेकर चली दशकों पुरानी लड़ाई में अब प्रदेश को बड़ी राहत मिली है। सुप्रीम कोर्ट के ताजा फैसले के बाद हिमाचल को करीब 11,973 मिलियन यूनिट बिजली मिलने का रास्ता साफ हो गया है। भाजपा प्रदेश अध्यक्ष डॉ. राजीव बिंदल ने इस फैसले को प्रदेश के अधिकारों की ऐतिहासिक जीत बताते हुए इसका श्रेय पूर्व मुख्यमंत्री प्रो. प्रेम कुमार धूमल की सरकार के कानूनी संघर्ष और केंद्र की मोदी सरकार के समाधानकारी प्रयासों को दिया है।
7 नवंबर को शिमला में जारी बयान में डॉ. राजीव बिंदल ने 6 नवंबर 2026 को सुप्रीम कोर्ट द्वारा दिए गए फैसले का स्वागत किया। उन्होंने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी, केंद्रीय ऊर्जा मंत्री मनोहर लाल खट्टर और केंद्र सरकार का आभार जताते हुए कहा कि हिमाचल के बिजली बकाये का मामला लंबे समय से लंबित था और अब इसके समाधान का रास्ता निकल पाया है।
बिंदल के अनुसार, हिमाचल की इस हिस्सेदारी की मांग की शुरुआत वर्ष 1966 में पंजाब के पुनर्गठन के बाद हुई थी। प्रदेश ने 1969 में केंद्र के समक्ष अपना दावा रखा था। कई स्तरों पर प्रयासों के बावजूद विवाद नहीं सुलझा तो वर्ष 1996 में सुप्रीम कोर्ट में मूल वाद दायर किया गया। इसके बाद प्रदेश के अधिकारों को लेकर लंबी कानूनी लड़ाई चली।
उन्होंने कहा कि इस मामले में 27 सितंबर 2011 का दिन बेहद महत्वपूर्ण रहा, जब प्रो. प्रेम कुमार धूमल के नेतृत्व वाली भाजपा सरकार के कार्यकाल में सुप्रीम कोर्ट ने हिमाचल प्रदेश की 7.19 प्रतिशत हिस्सेदारी के कानूनी अधिकार को मान्यता दी। बिंदल ने कहा कि इस फैसले ने प्रदेश के दावे को मजबूती दी और आगे के समाधान की नींव रखी।
भाजपा प्रदेश अध्यक्ष ने कांग्रेस पर निशाना साधते हुए कहा कि वर्ष 2012 में प्रदेश में सत्ता परिवर्तन के बाद भी बिजली बकाये का अंतिम निपटारा नहीं हो पाया। उन्होंने मुख्यमंत्री सुखविंदर सिंह सुक्खू से सवाल किया कि जब वर्ष 2011 में हिमाचल के अधिकार को न्यायिक मान्यता मिल चुकी थी, तो उसके बाद इतने वर्षों तक प्रदेश को पूरा बकाया क्यों नहीं मिला?
बिंदल ने कहा कि इस विवाद को सुलझाने में केंद्र सरकार की ओर से पेश किया गया कैशलेस सेटलमेंट फॉर्मूला निर्णायक साबित हुआ। इसके तहत नकद भुगतान के बजाय बिजली के रूप में बकाया हिस्सेदारी का निपटारा करने का प्रस्ताव दिया गया, जिसे सुप्रीम कोर्ट ने स्वीकार किया।
इस तरह तय हुई बिजली की हिस्सेदारी
बिंदल ने बताया कि केंद्र सरकार की गणना के अनुसार हिमाचल का कुल बिजली बकाया 13,066 मिलियन यूनिट आंका गया। इसमें प्रदेश की 420.77 करोड़ रुपये की पूंजीगत देनदारी को 3.85 रुपये प्रति यूनिट की दर से समायोजित किया गया, जिसके चलते करीब 1,093 मिलियन यूनिट की कटौती हुई। इसके बाद हिमाचल को लगभग 11,973 मिलियन यूनिट बिजली मिलनी है।
उन्होंने बताया कि सुप्रीम कोर्ट के आदेश के अनुसार पंजाब और हरियाणा अगले 20 वर्षों तक अक्टूबर से मार्च के बीच प्रतिवर्ष करीब 598 मिलियन यूनिट बिजली हिमाचल को उपलब्ध कराएंगे। बिंदल के मुताबिक इससे प्रदेश की दीर्घकालिक ऊर्जा जरूरतों को पूरा करने में मदद मिलेगी।
किशाऊ बांध और सिरमौर के पानी के मुद्दे पर भी साधा निशाना
डॉ. बिंदल ने किशाऊ बांध परियोजना का जिक्र करते हुए कहा कि इसके सफल क्रियान्वयन में केंद्र की मोदी सरकार की महत्वपूर्ण भूमिका है। उन्होंने दावा किया कि केंद्र सरकार ने परियोजना के खर्च का 90 प्रतिशत वहन करने की स्वीकृति दी है।
वहीं, उन्होंने मुख्यमंत्री सुखविंदर सिंह सुक्खू पर सिरमौर जिले के किसानों और जनता के हितों की अनदेखी करने का आरोप लगाया। बिंदल ने कहा कि सिरमौर के किसानों को मिलने वाले पानी के अधिकारों से समझौता कर दिल्ली और राजस्थान को पानी देने का फैसला किया गया है। उनके अनुसार, इससे जिले की आने वाली पीढ़ियों के हित प्रभावित हो सकते हैं।
अंत में बिंदल ने कहा कि बीबीएमबी का फैसला किसी एक व्यक्ति या राजनीतिक दल की व्यक्तिगत उपलब्धि नहीं, बल्कि हिमाचल प्रदेश के अधिकारों की जीत है। हालांकि, उन्होंने जोर देकर कहा कि इस मुकाम तक पहुंचने में धूमल सरकार के कार्यकाल में मिली न्यायिक सफलता और केंद्र सरकार के मौजूदा प्रयासों की अहम भूमिका रही है।
