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चंबा के सुईला गांव में सड़क का इंतजार खत्म नहीं, मरीजों के लिए चारपाई ही बनी एंबुलेंस; ग्रामीणों ने दी चुनाव बहिष्कार की चेतावनी
आजादी के 78 साल बाद भी सड़क से महरूम सुईला गांव, बीमारी और प्रसव के दौरान तीन किलोमीटर का रास्ता पार करना बनता है बड़ी चुनौती।
15 ग्रामीणों ने सड़क के लिए जमीन दी, वन विभाग की एनओसी भी मिली, लेकिन निर्माण शुरू नहीं होने से करीब 80 परिवारों में नाराजगी।
चंबा। हिमाचल प्रदेश के चंबा जिले के चुराह विधानसभा क्षेत्र में विकास के दावों के बीच एक गांव ऐसा भी है, जहां आज तक सड़क नहीं पहुंच पाई है। यहां किसी मरीज को अस्पताल ले जाना हो तो एंबुलेंस के बजाय चारपाई का सहारा लेना पड़ता है। खेतों में तैयार होने वाली फसल को सड़क तक पहुंचाने के लिए ग्रामीणों को अपनी पीठ और खच्चरों पर निर्भर रहना पड़ता है।
यह स्थिति ग्राम पंचायत जुनास के सुईला गांव की है। आजादी के 78 वर्ष बीत जाने के बावजूद गांव सड़क सुविधा से नहीं जुड़ पाया है। जुनास से सुईला तक लगभग तीन किलोमीटर का रास्ता करीब 80 परिवारों के लिए रोजमर्रा की जिंदगी की बड़ी परेशानी बना हुआ है। खासकर बीमार लोगों, गर्भवती महिलाओं और बुजुर्गों को इस रास्ते से गुजरने में भारी कठिनाइयों का सामना करना पड़ता है।
बीमार और गर्भवती महिलाओं को चारपाई पर पहुंचाना पड़ता है अस्पताल
ग्रामीणों का कहना है कि गांव में किसी व्यक्ति की तबीयत बिगड़ने या महिला को प्रसव के लिए अस्पताल ले जाने की नौबत आने पर परिजन और ग्रामीण चारपाई के सहारे मरीज को मुख्य सड़क तक पहुंचाते हैं। तीन किलोमीटर का यह पैदल सफर कई बार मरीजों के लिए बेहद जोखिम भरा हो जाता है। ग्रामीणों के अनुसार, रास्ते में लगने वाली देरी के कारण पहले भी गंभीर परिस्थितियां पैदा हो चुकी हैं।
सड़क न होने का असर केवल स्वास्थ्य सुविधाओं तक सीमित नहीं है। खेती-किसानी करने वाले परिवारों को भी अपनी उपज बाजार तक पहुंचाने के लिए अतिरिक्त खर्च और मेहनत उठानी पड़ती है। गांव में हर साल लगभग 800 क्विंटल हरे मटर का उत्पादन होता है, जिसे पीठ पर उठाकर या खच्चरों के माध्यम से मुख्य सड़क तक पहुंचाया जाता है। एक खच्चर के लिए 200 से 250 रुपये तक किराया देना पड़ता है।
ग्रामीणों ने सड़क के लिए विभाग को सौंपी 30 बिस्वा जमीन
सड़क निर्माण की राह में निजी भूमि की उपलब्धता बाधा न बने, इसके लिए ग्रामीणों ने भी पहल की है। गांव के 15 लोगों ने लगभग 30 बिस्वा निजी जमीन की गिफ्ट डीड लोक निर्माण विभाग के नाम कर दी है। इसके अलावा वन विभाग से आवश्यक अनापत्ति प्रमाणपत्र (एनओसी) भी मिल चुका है।
इसके बावजूद सड़क निर्माण का काम शुरू नहीं हो पाया है। लंबे समय से इंतजार कर रहे ग्रामीण अब विभागीय प्रक्रिया और बजट की कमी के चलते निराश हैं। उनका कहना है कि जब जमीन उपलब्ध है और वन विभाग की मंजूरी भी मिल चुकी है तो निर्माण कार्य में देरी का कारण समझ से परे है।
ग्रामीण इस सड़क को केवल आवागमन की सुविधा नहीं, बल्कि सीमावर्ती क्षेत्र की सुरक्षा के लिहाज से भी महत्वपूर्ण मानते हैं। उनका कहना है कि जम्मू-कश्मीर सीमा से सटे इस इलाके में सड़क संपर्क बेहद जरूरी है। ग्रामीणों ने वर्ष 1998 के सतरुंडी कांड का हवाला देते हुए भी क्षेत्र में बेहतर सड़क सुविधा की आवश्यकता जताई है।
एक करोड़ 20 लाख रुपये का प्रस्ताव तैयार, बजट का इंतजार
लोक निर्माण विभाग मंडल तीसा के अधिशासी अभियंता जोगेंद्र शर्मा के अनुसार, सड़क निर्माण के लिए ग्रामीणों ने जमीन उपलब्ध करवाई है और वन विभाग की एनओसी भी मिल चुकी है। इस सड़क के लिए करीब एक करोड़ 20 लाख रुपये का अनुमानित प्रस्ताव तैयार किया गया है। हालांकि, बैकवर्ड सब प्लान के तहत अभी बजट उपलब्ध नहीं हो पाया है। बजट मिलते ही निर्माण कार्य शुरू करवाया जाएगा।
विधायक ने 25 दिन में सड़क पहुंचाने का किया दावा
चुराह के विधायक हंसराज ने कहा कि बैकवर्ड प्लान के तहत पिछले चार वर्षों से धनराशि नहीं मिल रही है। उन्होंने अपने स्तर पर 25 दिनों के भीतर गांव तक सड़क पहुंचाने का दावा किया है।
विधायक के अनुसार, सांसद राजीव भारद्वाज की ओर से इसके लिए तीन लाख रुपये दिए गए हैं। सांसद हर्ष महाजन भी आर्थिक सहयोग करेंगे, जबकि शेष पांच लाख रुपये वह स्वयं उपलब्ध करवाएंगे। उन्होंने कहा कि अपने स्तर पर संसाधन जुटाकर सड़क पहुंचाने का प्रयास किया जाएगा।
2027 के विधानसभा चुनाव के बहिष्कार की चेतावनी
सड़क की मांग लंबे समय से उठाने के बावजूद समाधान नहीं होने से सुईला गांव के लोग नाराज हैं। ग्रामीणों ने चेतावनी दी है कि यदि सड़क निर्माण को लेकर जल्द ठोस कार्रवाई नहीं हुई तो वे वर्ष 2027 के विधानसभा चुनाव में मतदान का बहिष्कार करेंगे। साथ ही आंदोलन का रास्ता अपनाने की भी बात कही है।
ग्रामीण नरैण सिंह, धर्मेंद्र कुमार, किशोरी लाल, सोहन लाल, भगत राम, प्रेम राज और देस राज सहित अन्य लोगों का कहना है कि सड़क सुविधा के अभाव में गांव के लोगों को हर दिन परेशानियों से गुजरना पड़ रहा है। अब उनकी मांग है कि आश्वासनों के बजाय सड़क निर्माण का काम जमीन पर दिखाई देना चाहिए।
