कच्चे माल के दामों में 40 से 150% तक उछाल, ऊपर से करोड़ों का अपग्रेडेशन खर्च—छोटी फार्मा इकाइयों के सामने बड़ी चुनौती खड़ी हो गई है।
कच्चे माल की महंगाई और शेड्यूल-एम का करोड़ों का खर्च, छोटी फार्मा इकाइयों पर दोहरी मार
दवा की गुणवत्ता से समझौता संभव नहीं, लेकिन नए मानकों को पूरा करने की लागत ने छोटे उद्योगों की आर्थिक मुश्किलें बढ़ा दी हैं।
कालाअंब (सिरमौर)। सिरमौर के फार्मा उद्योग इन दिनों बढ़ती उत्पादन लागत और लगातार कड़े होते गुणवत्ता मानकों के बीच संतुलन बनाने की चुनौती से गुजर रहे हैं। एक तरफ एपीआई, रसायन, सॉल्वेंट और पैकेजिंग सामग्री की कीमतों में उल्लेखनीय वृद्धि हुई है, वहीं दूसरी ओर संशोधित शेड्यूल-एम के अनुरूप उत्पादन इकाइयों को अपग्रेड करने में भारी निवेश करना पड़ रहा है।
लघु उद्योग भारती फार्मा विंग के प्रदेश अध्यक्ष संजय सिंगला तथा कालाअंब के दवा उद्यमियों मनोज गर्ग, नितिन अग्रवाल, राकेश गोयल और संजय आहूजा ने कहा कि दवाओं की गुणवत्ता और नियामकीय मानकों के पालन में किसी तरह की ढिलाई नहीं हो सकती। हालांकि, सीमित संसाधनों के साथ काम कर रही छोटी और मध्यम इकाइयों के लिए नए मानकों के अनुरूप ढांचा तैयार करना आर्थिक रूप से चुनौतीपूर्ण साबित हो रहा है।
उद्यमियों के अनुसार, संशोधित शेड्यूल-एम की आवश्यकताओं को पूरा करने के लिए कई इकाइयों को मशीनरी, गुणवत्ता प्रबंधन प्रणाली, उत्पादन सुविधाओं, वेयरहाउसिंग और अन्य तकनीकी ढांचे में बड़े स्तर पर निवेश करना पड़ रहा है। कुछ इकाइयों में यह खर्च करोड़ों रुपये तक पहुंच रहा है।
कच्चे माल की बढ़ी लागत ने बढ़ाई परेशानी
फार्मा उद्योग में इस्तेमाल होने वाले एपीआई, विभिन्न केमिकल, सॉल्वेंट और पैकिंग सामग्री के दाम बढ़ने से उत्पादन लागत लगातार ऊपर जा रही है। उद्यमियों का कहना है कि जब इनपुट लागत में इतनी तेजी से वृद्धि हो रही हो और साथ ही गुणवत्ता संबंधी बुनियादी ढांचे में भी निवेश करना पड़े, तो छोटी इकाइयों के लिए वित्तीय दबाव काफी बढ़ जाता है।
उन्होंने कहा कि अंतरराष्ट्रीय गुणवत्ता मानकों के अनुरूप उत्पादन व्यवस्था विकसित करना समय की आवश्यकता है। इसके लिए कर्मचारियों को नियमित प्रशिक्षण देने के साथ-साथ डेटा इंटीग्रिटी, जीएमपी और क्वालिटी मैनेजमेंट से जुड़े प्रावधानों को भी प्रभावी तरीके से लागू करना जरूरी है।
नियमों के साथ सहयोग भी जरूरी
फार्मा उद्यमियों ने कहा कि सरकारी योजनाओं के माध्यम से उद्योगों को सहायता उपलब्ध कराने के प्रयास किए जा रहे हैं, लेकिन यह सहयोग जमीनी स्तर पर जरूरतमंद छोटी इकाइयों तक अधिक प्रभावी ढंग से पहुंचना चाहिए।
उन्होंने सरकार और संबंधित नियामक संस्थाओं से मांग की कि शेड्यूल-एम और अन्य गुणवत्ता मानकों को लागू करने के साथ छोटी इकाइयों के लिए तकनीकी मार्गदर्शन, प्रशिक्षण, विशेषज्ञ सहायता और वित्तीय सहयोग की व्यवस्था को और मजबूत किया जाए।
उद्यमियों के मुताबिक, नियमों का पालन और दवाओं की गुणवत्ता सर्वोच्च प्राथमिकता है, लेकिन छोटे उद्योगों की वास्तविक परिस्थितियों को ध्यान में रखते हुए उन्हें संक्रमण अवधि में व्यावहारिक सहयोग मिलने से वे गुणवत्ता मानकों को बेहतर तरीके से लागू कर सकेंगे और उत्पादन गतिविधियों को भी सुचारु बनाए रख सकेंगे।
