घेपन झील फटी तो 5 मिनट में तबाही? 14 कि. मी. पैदल पहुंचीं डीसी किरण भड़ाना, सामने आया बड़ा खतरा
घेपन झील का पानी फटने की स्थिति में महज पांच मिनट में आबादी वाले इलाके तक पहुंच सकता है। संभावित खतरे को देखते हुए लाहौल-स्पीति प्रशासन ने निगरानी, अर्ली वार्निंग सिस्टम और निकासी व्यवस्था को मजबूत करने की कवायद तेज कर दी है।
केलांग (लाहौल-स्पीति)। लाहौल-स्पीति की घेपन ग्लेशियल झील के बढ़ते जलस्तर और संभावित आपदा जोखिम को लेकर प्रशासन ने तैयारियां तेज कर दी हैं। उपायुक्त एवं जिला आपदा प्रबंधन प्राधिकरण (DDMA) की अध्यक्ष किरण भड़ाना ने करीब 14 किलोमीटर की कठिन पैदल यात्रा कर पहली बार स्वयं घेपन झील का स्थल निरीक्षण किया। वह इस झील तक पहुंचने वाली पहली महिला आईएएस अधिकारी बनी हैं।
निरीक्षण के दौरान उपायुक्त ने झील के जलस्तर, आसपास मौजूद ग्लेशियरों, पहाड़ी भू-भाग और संभावित पानी के बहाव के रास्तों का जायजा लिया। उन्होंने कहा कि घेपन झील के आसपास बड़ी संख्या में ग्लेशियर और ऊंचे पर्वतीय क्षेत्र मौजूद हैं, इसलिए इन क्षेत्रों की स्थिरता पर नियमित वैज्ञानिक निगरानी बेहद जरूरी है।
पांच मिनट में आबादी तक पहुंच सकता है पानी
किरण भड़ाना ने बताया कि विभिन्न आकलनों के अनुसार, अगर किसी आपदा की स्थिति में झील का पानी अचानक नीचे की ओर आता है तो करीब 22 मिनट में आबादी वाले क्षेत्र तक पहुंचने की संभावना जताई गई है। हालांकि, मौके की भौगोलिक परिस्थितियों और पानी के संभावित बहाव को देखते हुए प्रशासन का आकलन है कि कुछ परिस्थितियों में यह समय घटकर करीब पांच मिनट भी हो सकता है।
उन्होंने कहा कि ऐसे संभावित खतरे को देखते हुए संवेदनशील क्षेत्रों के लिए प्रभावी निकासी योजना तैयार करना, नियमित मॉक ड्रिल करवाना, लोगों को जागरूक करना और त्वरित प्रतिक्रिया प्रणाली को मजबूत करना जरूरी है। समय रहते लोगों को सुरक्षित स्थानों तक पहुंचाने की स्पष्ट व्यवस्था संभावित नुकसान को कम करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकती है।
अर्ली वार्निंग सिस्टम लगाने की तैयारी
प्रशासन घेपन झील में अर्ली वार्निंग सिस्टम स्थापित करने की दिशा में काम कर रहा है। इस प्रणाली के जरिए जलस्तर समेत अन्य महत्वपूर्ण मानकों की लगातार निगरानी की जाएगी और खतरे की स्थिति में समय रहते चेतावनी जारी करने में मदद मिलेगी।
अधिकारियों के अनुसार, सी-डैक (C-DAC), तिरुवनंतपुरम की ओर से विकसित तकनीक का सिस्सू झील में परीक्षण किया जा चुका है। अब इसी तरह की निगरानी व्यवस्था को घेपन झील जैसे संवेदनशील क्षेत्रों में लागू करने पर काम किया जा रहा है।
वैज्ञानिक निगरानी और विभागीय समन्वय पर जोर
उपायुक्त ने कहा कि ऊंचाई वाले दुर्गम इलाकों में प्राकृतिक परिस्थितियां तेजी से बदल सकती हैं। ऐसे में पूर्व तैयारी, लगातार निगरानी, वैज्ञानिक आकलन और विभिन्न विभागों के बीच बेहतर समन्वय आपदा जोखिम को कम करने के लिए जरूरी है।
उन्होंने कहा कि नेपाल में पिछले महीने हुई ग्लेशियर से जुड़ी त्रासदी ने ऐसे संभावित खतरों को लेकर सतर्कता की जरूरत को और स्पष्ट किया है। घेपन झील क्षेत्र की निगरानी व्यवस्था को मजबूत करने के लिए राज्य आपदा प्रबंधन प्राधिकरण (SDMA) और राष्ट्रीय आपदा प्रबंधन प्राधिकरण (NDMA) के साथ समन्वय किया जाएगा।
10 विभागों की 15 सदस्यीय टीम ने किया निरीक्षण
घेपन झील के निरीक्षण के लिए करीब 10 विभागों के 15 अधिकारियों और कर्मचारियों की टीम भी मौके तक पहुंची। टीम में परियोजना अधिकारी आईटीडीपी अश्वनी कुमार शर्मा, उप वन क्षेत्रपाल लीला मणि, चिकित्सा अधिकारी डॉ. सुषमा और डॉ. विक्रांत नेगी, बीआरओ 94 आरसीसी के प्रभारी कैप्टन हरिओम शरण, अग्निशमन केंद्र केलांग के प्रभारी रतन चंद और होमगार्ड फायरमैन छेरिंग आंगरुप समेत विभिन्न विभागों के अधिकारी-कर्मचारी शामिल रहे।
टीम में आईटीडीपी के कनिष्ठ कार्यालय सहायक अजीत सिंह, जल शक्ति विभाग के कनिष्ठ अभियंता पंकज महाजन, पंप अटेंडेंट अरविंद कुमार, एचपीएसईबीएल के वरिष्ठ सहायक संजय कुमार और कनिष्ठ सहायक रोबिन, वन रक्षक बलवीर सिंह तथा उपायुक्त के निजी सुरक्षा अधिकारी ईश्वर दास भी शामिल रहे।
अत्यधिक दुर्गम और कठिन भौगोलिक परिस्थितियों के कारण टीम के अन्य सदस्यों के लिए झील के नीचे बेस कैंप में रात्रि ठहरने की व्यवस्था की गई थी। उपायुक्त निरीक्षण पूरा करने के बाद मंगलवार को ही वापस लौट आईं, जबकि टीम के अन्य सदस्य बुधवार दोपहर बाद केलांग पहुंचे।
