हिमाचल की नदियां अब बन सकती हैं 3000 करोड़ की कमाई का जरिया!
सुक्खू सरकार ने अलग माइनिंग विभाग बनाने और नई ड्रेजिंग नीति लाने का बड़ा ऐलान किया है।
शिमला: हिमाचल प्रदेश की नदियों में जमा रेत, बजरी, गाद और मलबा अब सरकार के लिए सिर्फ पर्यावरण से जुड़ी चुनौती नहीं रहेगा। राज्य सरकार इन प्राकृतिक संसाधनों को व्यवस्थित तरीके से उपयोग में लाकर राजस्व बढ़ाने की तैयारी में है। मुख्यमंत्री सुखविंद्र सिंह सुक्खू ने विधानसभा में प्रदेश में अलग माइनिंग विभाग गठित करने और नई ड्रेजिंग नीति लाने की घोषणा की है।
विधानसभा के अंतिम दिन प्रश्नकाल के दौरान बंजार के विधायक सुरेंद्र शौरी के सवाल का जवाब देते हुए मुख्यमंत्री ने कहा कि हिमाचल में खनन और ड्रेजिंग को वैज्ञानिक एवं व्यवस्थित तरीके से संचालित किया जाए तो राज्य को सालाना करीब 3000 करोड़ रुपये तक का राजस्व प्राप्त हो सकता है।
मुख्यमंत्री के मुताबिक हिमाचल से पांच प्रमुख नदियां गुजरती हैं और यहां खनिज संसाधनों की पर्याप्त संभावनाएं हैं। उन्होंने उत्तराखंड का उदाहरण देते हुए कहा कि वहां दो बड़ी नदियों से खनन के जरिए हर साल करीब 300 से 400 करोड़ रुपये का राजस्व प्राप्त हो रहा है। ऐसे में हिमाचल में उपलब्ध संसाधनों के बेहतर प्रबंधन से आय में बड़ा इजाफा किया जा सकता है।
अलग माइनिंग विभाग बनाने की तैयारी
फिलहाल प्रदेश में खनन से संबंधित काम उद्योग विभाग के माइनिंग विंग के जरिए संचालित किया जा रहा है। मुख्यमंत्री ने कहा कि काम का दायरा लगातार बढ़ने के कारण अब स्वतंत्र माइनिंग विभाग बनाने पर गंभीरता से विचार किया जा रहा है।
सरकार का मानना है कि अलग विभाग बनने से माइनिंग और ड्रेजिंग से जुड़े कामों को ज्यादा प्रभावी तरीके से संचालित किया जा सकेगा और राजस्व व्यवस्था को भी मजबूत किया जा सकेगा।
आपदा के बाद ड्रेजिंग पर बढ़ा जोर
साल 2023 की प्राकृतिक आपदा के बाद हिमाचल की नदियों में बड़ी मात्रा में गाद, रेत और मलबा जमा हुआ था। इसी दौरान केंद्रीय सड़क परिवहन मंत्री नितिन गडकरी ने नदियों से जमा सामग्री हटाने के लिए ड्रेजिंग का सुझाव दिया था।
केंद्र से अनुमति मिलने के बाद कुल्लू में तीन स्थानों पर ड्रेजिंग का काम शुरू किया गया। राज्य सरकार के अनुसार अब तक विभिन्न परियोजनाओं के माध्यम से करीब 74 हजार टन सामग्री निकाली जा चुकी है।
ड्रेजिंग सामग्री की नीलामी होगी
उद्योग मंत्री हर्षवर्धन चौहान ने स्पष्ट किया कि ड्रेजिंग और माइनिंग दो अलग-अलग प्रक्रियाएं हैं। ड्रेजिंग से निकलने वाली सामग्री को सीधे बेचने के बजाय नियमानुसार उसकी नीलामी करनी होगी। इसी व्यवस्था को स्पष्ट करने के लिए प्रदेश सरकार नई ड्रेजिंग नीति तैयार कर रही है।
फिलहाल कई स्थानों पर ड्रेजिंग का काम हिमाचल प्रदेश वन निगम के माध्यम से कराया गया है। सरकार की योजना है कि भविष्य में अलग माइनिंग विभाग बनने के बाद ड्रेजिंग और माइनिंग से जुड़ी गतिविधियों को एकीकृत व्यवस्था के तहत संचालित किया जाए।
रॉयल्टी को लेकर केंद्र से भी साफ रुख
हाल ही में केंद्रीय पर्यावरण मंत्रालय के साथ हुई बैठक में ड्रेजिंग से निकलने वाली सामग्री के इस्तेमाल का मुद्दा भी उठा। केंद्र की ओर से इस सामग्री को सड़क निर्माण में इस्तेमाल करने की बात कही गई। हालांकि राज्य सरकार ने स्पष्ट किया कि सामग्री से मिलने वाली रॉयल्टी पर हिमाचल का अधिकार है और इस मुद्दे पर कोई समझौता नहीं किया जाएगा।
वर्तमान में हिमाचल प्रदेश को माइनिंग रॉयल्टी से करीब 350 करोड़ रुपये सालाना की आय हो रही है। सरकार का दावा है कि नई ड्रेजिंग नीति और स्वतंत्र माइनिंग विभाग के जरिए इस आय को कई गुना बढ़ाया जा सकता है।
जयराम ठाकुर ने उठाए सवाल
वहीं, नेता प्रतिपक्ष जयराम ठाकुर ने सरकार के इस कदम पर सवाल खड़े किए हैं। उन्होंने आरोप लगाया कि सरकार आपदा को अवसर में बदलने की कोशिश कर रही है। उन्होंने ब्यास नदी में हुई ड्रेजिंग की जांच की मांग करते हुए सवाल उठाया कि ड्रेजिंग से निकली सामग्री आखिर कहां गई और उससे सरकार को कितनी आय हुई।
जयराम ठाकुर ने भारी मशीनरी के इस्तेमाल और ड्रेजिंग से निकली सामग्री की बिक्री में संभावित अनियमितताओं का आरोप भी लगाया है।
अब नई ड्रेजिंग नीति और प्रस्तावित अलग माइनिंग विभाग के जरिए सरकार किस तरह इस पूरे क्षेत्र को नियंत्रित करती है, यह आने वाले समय में महत्वपूर्ण होगा। अगर सरकार की योजना जमीन पर प्रभावी ढंग से लागू होती है, तो नदियों से जुड़े संसाधन हिमाचल के लिए बड़े राजस्व स्रोत में बदल सकते हैं।
