Solan News: माजरा कचरा संयंत्र पर कानूनी शिकंजा, 60 दिन का नोटिस; NGT में भी पहुंचा मामला
माजरा के कचरा संयंत्र को लेकर विवाद अब सड़क से निकलकर कानूनी लड़ाई तक पहुंच गया है। जल प्रदूषण के कथित आरोपों पर 60 दिन का कानूनी नोटिस जारी होने के साथ ही मामला राष्ट्रीय हरित अधिकरण (NGT) तक पहुंच गया है, जिससे आने वाले दिनों में कार्रवाई की तस्वीर साफ हो सकती है।
नालागढ़ (सोलन)। माजरा स्थित शिवालिक ठोस कचरा प्रबंधन संयंत्र को लेकर उठ रहे विवाद के बीच अब कानूनी कार्रवाई की प्रक्रिया शुरू हो गई है। पंजाब मोर्चा के संयोजक कुमार गौरव राणा ने हिमाचल प्रदेश राज्य प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड के सदस्य सचिव को जल प्रदूषण निवारण एवं नियंत्रण अधिनियम के तहत 60 दिन का कानूनी नोटिस भेजा है।
नोटिस में संयंत्र से जल प्रदूषण से जुड़े नियमों के कथित उल्लंघन पर कार्रवाई की मांग की गई है। इसमें कहा गया है कि यदि निर्धारित 60 दिन की अवधि में संबंधित विभाग की ओर से कार्रवाई नहीं की जाती है तो संयंत्र के जिम्मेदार निदेशकों और प्रबंधन के खिलाफ सक्षम अदालत में आपराधिक शिकायत दायर की जा सकती है।
NGT में भी उठाया गया मामला
माजरा स्थित संयंत्र का मुद्दा राष्ट्रीय हरित अधिकरण (NGT) के समक्ष भी उठाया गया है। ऐसे में अब प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड की संभावित कार्रवाई के साथ-साथ एनजीटी में मामले की सुनवाई पर भी नजर रहेगी।
प्रदूषण बोर्ड से संबंधित दस्तावेजों के अनुसार शिवालिक ठोस कचरा प्रबंधन लिमिटेड को रेड जोन में दर्ज किया गया है। संयंत्र की वार्षिक क्षमता करीब 50 हजार मीट्रिक टन बताई गई है। दस्तावेजों में इकाई के संचालन की सहमति 31 मार्च 2024 तक दर्ज होने की जानकारी भी सामने आई है।
सरसा नदी के प्रदूषित हिस्से का भी हवाला
मामले में केंद्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड (CPCB) के आंकड़ों का भी हवाला दिया गया है। आंकड़ों के मुताबिक सरसा नदी का सिटोमाजरी नाले से बद्दी तक का हिस्सा प्रदूषित नदी खंड के तौर पर दर्ज है।
वर्ष 2022-23 के आंकड़ों में इस क्षेत्र में अधिकतम जैव-रासायनिक ऑक्सीजन मांग (BOD) 45 मिलीग्राम प्रति लीटर दर्ज की गई थी। BOD का बढ़ा स्तर पानी में जैविक प्रदूषण की स्थिति का संकेत माना जाता है।
धारा 24, 25 और 26 के उल्लंघन का आरोप
कानूनी नोटिस में संयंत्र पर जल प्रदूषण निवारण एवं नियंत्रण अधिनियम की धारा 24, 25 और 26 के लगातार उल्लंघन का आरोप लगाया गया है। नोटिस में संबंधित प्रावधानों के तहत धारा 41, 43, 44 और 47 के अंतर्गत कार्रवाई की मांग की गई है।
स्थानीय ग्रामीणों की ओर से भी संयंत्र को लेकर दुर्गंध, प्रदूषण और बिना उपचार किए दूषित पानी के रिसाव जैसी शिकायतें सामने आने का उल्लेख किया गया है। इन शिकायतों की वास्तविक स्थिति का पता लगाने के लिए पानी और भूजल के नमूनों की वैज्ञानिक जांच कराने की मांग भी उठाई गई है।
60 दिन बाद कार्रवाई पर रहेगी नजर
अब इस मामले में 60 दिन की कानूनी अवधि महत्वपूर्ण होगी। इस दौरान प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड की ओर से क्या कदम उठाए जाते हैं और एनजीटी में मामले की सुनवाई किस दिशा में आगे बढ़ती है, इस पर नजर रहेगी।
हालांकि, संयंत्र पर लगाए गए प्रदूषण संबंधी आरोपों की वास्तविक स्थिति वैज्ञानिक जांच और संबंधित विभागों की कार्रवाई के बाद ही स्पष्ट हो सकेगी।
