पिता का साया ढाई साल में उठा, मां ने मजदूरी कर बेटी को बनाया धावक; अब नेपाल में नीतू ने जीता Gold
चंबा के चुराह की बेटी नीतू ने नेपाल के पोखरा में 100 मीटर दौड़ में स्वर्ण पदक जीतकर अपनी रफ्तार का लोहा मनवा दिया। ढाई साल की उम्र में पिता को खोने वाली नीतू की इस कामयाबी के पीछे मां बालो देवी का संघर्ष और बेटी की वर्षों की कड़ी मेहनत है।
चंबा। हिमाचल प्रदेश के चंबा जिले के चुराह क्षेत्र की बेटी नीतू ने अंतरराष्ट्रीय स्तर पर शानदार प्रदर्शन करते हुए नेपाल में आयोजित यूथ गेम्स इंटरनेशनल चैंपियनशिप में 100 मीटर दौड़ का स्वर्ण पदक अपने नाम किया है। नेपाल के पोखरा में हुई इस प्रतियोगिता में नीतू ने अपनी तेज रफ्तार से प्रतिद्वंद्वियों को पीछे छोड़ते हुए Gold Medal हासिल किया।
नीतू की इस उपलब्धि से चुराह क्षेत्र में खुशी का माहौल है। खास बात यह है कि अंतरराष्ट्रीय स्तर पर पहुंचने वाली इस धावक की सफलता की कहानी संघर्षों से होकर गुजरी है।
ढाई साल की उम्र में उठ गया था पिता का साया
नीतू चरोड़ी पंचायत के सुखरेठी गांव की रहने वाली हैं। वह परस राम की बेटी हैं। जब नीतू महज ढाई साल की थीं, तभी उनके पिता का निधन हो गया। इसके बाद परिवार की पूरी जिम्मेदारी उनकी मां बालो देवी के कंधों पर आ गई।
मां ने मजदूरी कर बेटी का पालन-पोषण किया और उसकी पढ़ाई जारी रखी। आर्थिक परेशानियों के बावजूद उन्होंने नीतू के सपनों को रुकने नहीं दिया। नीतू ने भी परिस्थितियों के आगे हार मानने के बजाय अपनी मेहनत जारी रखी।
दौड़ में दिखी प्रतिभा तो बढ़ता गया हौसला
नीतू को बचपन से ही खेलों में खास दिलचस्पी थी। दौड़ के प्रति उनकी प्रतिभा को परिवार और शिक्षकों ने पहचाना। इसके बाद उन्होंने दौड़ को गंभीरता से लेना शुरू किया और नियमित अभ्यास के जरिए अपनी गति और फिटनेस को बेहतर बनाया।
स्थानीय स्तर की प्रतियोगिताओं में प्रदर्शन करते हुए नीतू लगातार आगे बढ़ती गईं। अब नेपाल में 100 मीटर दौड़ में स्वर्ण पदक जीतकर उन्होंने अपनी मेहनत को अंतरराष्ट्रीय मंच पर पहचान दिलाई है।
बिहार अकादमी में ले रही हैं प्रशिक्षण
नीतू ने कल्हेल विद्यालय से जमा दो की पढ़ाई पूरी की है। वर्तमान में वह बिहार अकादमी में प्रशिक्षण ले रही हैं। यहां वह दौड़ की तकनीक, स्पीड, फिटनेस और प्रतियोगिताओं के लिए जरूरी तैयारी पर लगातार मेहनत कर रही हैं।
नीतू का लक्ष्य खेल के क्षेत्र में और आगे बढ़ना तथा राष्ट्रीय एवं अंतरराष्ट्रीय स्तर पर हिमाचल और देश का नाम रोशन करना है।
संघर्ष से सफलता तक पहुंची नीतू
नीतू की कहानी केवल एक स्वर्ण पदक जीतने की कहानी नहीं है। पिता को कम उम्र में खोने के बाद मां के संघर्ष में पली-बढ़ी नीतू ने सीमित संसाधनों के बीच अपने सपने को जिंदा रखा और मेहनत के दम पर अंतरराष्ट्रीय मंच तक पहुंच बनाई।
नेपाल में मिला यह गोल्ड मैडल चुराह की इस बेटी के लिए एक बड़ी उपलब्धि है और उन तमाम बेटियों के लिए भी संदेश है, जो मुश्किल परिस्थितियों के बावजूद खेल और दूसरे क्षेत्रों में बड़ा मुकाम हासिल करने का सपना देखती हैं।
