Groundwater Crisis: पंजाब में खत्म हो रहा भूजल, IIT मंडी की 20 साल की रिसर्च ने बताई सबसे बड़ी वजह
अगर खेती का तरीका नहीं बदला तो आने वाले वर्षों में पंजाब के कई इलाकों में सिंचाई ही नहीं, पीने के पानी का भी गंभीर संकट खड़ा हो सकता है।
आईआईटी मंडी की 20 साल की रिसर्च ने चौंकाने वाला खुलासा किया है कि भूजल संकट की सबसे बड़ी वजह बारिश की कमी नहीं, बल्कि धान की खेती के लिए भूजल का लगातार बढ़ता दोहन है।
चंडीगढ़/मंडी। पंजाब में लगातार गिरते भूजल स्तर को लेकर भारतीय प्रौद्योगिकी संस्थान (आईआईटी) मंडी के वैज्ञानिकों ने महत्वपूर्ण शोध किया है। वर्ष 2000 से 2020 तक के आंकड़ों पर आधारित इस अध्ययन में सामने आया है कि राज्य में भूजल संकट प्राकृतिक कारणों से नहीं, बल्कि मानवजनित गतिविधियों का परिणाम है। खासतौर पर धान की खेती और सिंचाई के लिए ट्यूबवेलों से बड़े पैमाने पर पानी निकालने से भूजल तेजी से नीचे जा रहा है।
यह शोध आईआईटी मंडी के स्कूल ऑफ सिविल एंड एनवायरनमेंटल इंजीनियरिंग की शोधार्थी हरसिमरनजीत कौर रोमाना, अमेरिका की चैपमैन यूनिवर्सिटी के प्रो. रमेश पी. सिंह तथा आईआईटी मंडी के प्रो. डेरिक्स प्रेज शुक्ला ने संयुक्त रूप से किया है। यह अध्ययन 13 जुलाई को प्रतिष्ठित अंतरराष्ट्रीय जर्नल Advances in Space Research में प्रकाशित हुआ।
दक्षिण-पश्चिम पंजाब सबसे ज्यादा प्रभावित
अध्ययन के अनुसार दक्षिण-पश्चिम पंजाब के मुक्तसर, बठिंडा, फिरोजपुर, मानसा और मोगा जिले भूजल संकट से सबसे अधिक प्रभावित हैं। शोध में पाया गया कि वर्ष 2015 के बाद भूजल भंडारण में गिरावट और तेज हो गई, जबकि 2018 से 2020 के बीच कई इलाकों में जलस्तर रिकॉर्ड निचले स्तर पर पहुंच गया। बठिंडा, पटियाला, संगरूर, बरनाला, लुधियाना, जालंधर और मोगा में भूजल भंडारण में सबसे अधिक गिरावट दर्ज की गई।
भूजल की गुणवत्ता भी लगातार बिगड़ रही
रिसर्च में यह भी सामने आया कि केवल भूजल की मात्रा ही नहीं घट रही, बल्कि उसकी गुणवत्ता भी तेजी से खराब हो रही है। सोडियम एडसॉर्प्शन रेशियो (SAR) के आधार पर सिंचाई के लिए अनुपयुक्त क्षेत्रों की संख्या वर्ष 2000 में 13 थी, जो 2020 में बढ़कर 20 हो गई। वहीं सोडियम प्रतिशत के आधार पर अनुपयुक्त क्षेत्रों की संख्या 12 से बढ़कर 47 तक पहुंच गई।
315 भूजल नमूनों और नासा के आंकड़ों का किया विश्लेषण
शोधकर्ताओं ने केंद्रीय भूजल बोर्ड (CGWB) के 315 भूजल नमूनों, नासा के वर्षा संबंधी आंकड़ों और उपग्रह आधारित भूजल भंडारण डेटा का विश्लेषण किया। अध्ययन में पाया गया कि पंजाब में दीर्घकालिक रूप से वर्षा में कोई बड़ी कमी नहीं आई, लेकिन सिंचाई के लिए भूजल का उपयोग लगातार बढ़ता गया।
विशेषज्ञों के अनुसार धान की एक फसल के लिए प्रति हेक्टेयर लगभग 3,000 से 5,000 घनमीटर पानी की आवश्यकता होती है। वर्षों से बड़े पैमाने पर ट्यूबवेलों के जरिए पानी निकाला जा रहा है, जबकि भूजल का प्राकृतिक पुनर्भरण उसी गति से नहीं हो पा रहा। यही असंतुलन आज राज्य के भूजल संकट का प्रमुख कारण बन गया है।
टिकाऊ खेती अपनाने की जरूरत
आईआईटी मंडी के प्रोफेसर डेरिक्स प्रेज शुक्ला का कहना है कि यदि कम पानी वाली फसलों को बढ़ावा नहीं दिया गया, भूजल संरक्षण तकनीकों को नहीं अपनाया गया और सिंचाई व्यवस्था में सुधार नहीं किया गया, तो पंजाब में भविष्य में जल संकट और गंभीर हो सकता है। उनका मानना है कि यह अध्ययन टिकाऊ कृषि और प्रभावी भूजल प्रबंधन की नीतियां बनाने में अहम भूमिका निभा सकता है।
