HP Panchayat News: चुनाव जीतने के बाद पंचायत प्रतिनिधि को हटाना आसान नहीं, हाईकोर्ट ने बताया कानूनी रास्ता
क्या पंचायत चुनाव जीतने के बाद किसी प्रधान या सदस्य को सीधे अयोग्य घोषित किया जा सकता है?
हिमाचल प्रदेश हाईकोर्ट ने इस सवाल पर अहम फैसला सुनाते हुए स्पष्ट कर दिया है कि चुनाव के बाद प्रतिनिधि को हटाने का कानूनी रास्ता क्या होगा।
शिमला। हिमाचल प्रदेश हाईकोर्ट ने पंचायती राज संस्थाओं से जुड़े एक महत्वपूर्ण मामले में स्पष्ट किया है कि यदि किसी पंचायत प्रतिनिधि पर चुनाव लड़ने से पहले सरकारी भूमि पर अतिक्रमण करने का आरोप है और वही स्थिति चुनाव के बाद भी बनी हुई है, तो ऐसे मामले में उसे पद से हटाने या चुनाव रद्द कराने का एकमात्र कानूनी उपाय चुनाव याचिका (Election Petition) है।
न्यायमूर्ति ज्योत्सना रिवाल दुआ की अदालत ने अपने फैसले में कहा कि हिमाचल प्रदेश पंचायती राज अधिनियम की धारा 122(2)(बी) के तहत उपायुक्त केवल उन मामलों में कार्रवाई कर सकते हैं, जिनमें अयोग्यता चुनाव प्रक्रिया पूरी होने के बाद उत्पन्न हुई हो। यदि कथित अयोग्यता या अतिक्रमण चुनाव से पहले का है, तो उसका निर्णय केवल पंचायती राज अधिनियम की धारा 163 के तहत दायर चुनाव याचिका के माध्यम से ही किया जाएगा।
अदालत ने यह भी स्पष्ट किया कि सामान्य परिस्थितियों में चुनाव परिणाम घोषित होने के 30 दिनों के भीतर चुनाव याचिका दायर की जानी चाहिए। इसी के साथ अदालत ने याचिकाकर्ता नेत्र सिंह को कानून के अनुसार चुनाव याचिका दायर करने की स्वतंत्रता प्रदान की।
65 बीघा सरकारी भूमि पर अतिक्रमण का आरोप
यह मामला सिरमौर जिले की राजगढ़ तहसील स्थित ग्राम पंचायत जडोल तपरोली से जुड़ा है। याचिका में आरोप लगाया गया था कि नवनिर्वाचित प्रधान और उनके पति ने करीब 65 बीघा सरकारी भूमि पर सेब का बगीचा लगाकर कब्जा कर रखा है। याचिकाकर्ता का कहना था कि सरकारी भूमि पर अतिक्रमण करने वाला व्यक्ति या उसके परिवार का सदस्य पंचायत चुनाव लड़ने और पद पर बने रहने के लिए अयोग्य माना जाता है।
प्रशासन को भी दिए निर्देश
हाईकोर्ट ने प्रशासनिक अधिकारियों को निर्देश दिए कि सरकारी भूमि पर कथित अतिक्रमण की शिकायतों की जांच हिमाचल प्रदेश भू-राजस्व अधिनियम के प्रावधानों के अनुसार की जाए और नियमानुसार आवश्यक कार्रवाई सुनिश्चित की जाए।
इस फैसले को पंचायती राज संस्थाओं से जुड़े मामलों में महत्वपूर्ण माना जा रहा है, क्योंकि इससे यह स्पष्ट हो गया है कि चुनाव से पहले मौजूद कथित अयोग्यता के मामलों में चुनाव परिणाम घोषित होने के बाद सीधे प्रशासनिक कार्रवाई नहीं की जा सकती, बल्कि इसके लिए चुनाव याचिका ही वैधानिक उपाय है।
