हिमाचल में सेब सीजन पर श्रमिक संकट का असर: दिहाड़ी ₹600 पहुंची, तुड़ाई-ढुलाई ने बढ़ाई बागवानों की मुश्किलें
अगर समय पर सेब नहीं तोड़े गए, तो लाखों रुपये की फसल बागों में ही खराब हो सकती है।
हिमाचल में इस बार सेब सीजन के बीच मजदूरों की भारी कमी ने बागवानों की चिंता बढ़ा दी है, जबकि दिहाड़ी 600 रुपये तक पहुंच चुकी है।
शिमला: हिमाचल प्रदेश में सेब सीजन के दौरान श्रमिकों की कमी एक गंभीर समस्या बनकर सामने आई है। नेपाली मजदूरों की संख्या में आई गिरावट का सीधा असर सेब की तुड़ाई और मंडियों तक ढुलाई पर पड़ रहा है। पर्याप्त श्रमिक उपलब्ध न होने से बागवानों को समय पर फसल तैयार करने में कठिनाइयों का सामना करना पड़ रहा है, वहीं मजदूरी दरों में भी उल्लेखनीय बढ़ोतरी दर्ज की गई है।
जानकारी के अनुसार, इस समय अकुशल श्रमिकों की दिहाड़ी 600 रुपये तक पहुंच गई है। इसके बावजूद कई इलाकों में जरूरत के मुताबिक मजदूर नहीं मिल रहे हैं। इससे बागवानों की उत्पादन लागत बढ़ रही है और समय पर फसल बाजार तक पहुंचाने की चुनौती भी गहराती जा रही है।
खाड़ी देशों की ओर बढ़ा नेपाली श्रमिकों का रुझान
नेपाली समाज भारत के अध्यक्ष जोखी राम के अनुसार, नेपाली श्रमिकों के पास अब पहले की तुलना में रोजगार के अधिक विकल्प मौजूद हैं। खाड़ी देशों में बेहतर वेतन और सुविधाएं मिलने के कारण बड़ी संख्या में श्रमिक वहां का रुख कर रहे हैं। उन्होंने यह भी कहा कि हिमाचल में उन्हें विशेष सुविधाएं नहीं मिलतीं और इस बार सेब सीजन भी अपेक्षाकृत कमजोर माना जा रहा है।
बढ़ती लागत से परेशान बागवान
हिमाचल प्रदेश फल, फूल एवं सब्जी उत्पादक संघ के अध्यक्ष हरीश चौहान ने बताया कि उपलब्ध श्रमिक कम मजदूरी पर काम करने को तैयार नहीं हैं। श्रमिकों की कमी के कारण बागवानों की लागत लगातार बढ़ रही है, जिससे उनकी आर्थिक चिंता और गहरा गई है।
विभाग ने भी मानी श्रमिकों की कमी
राज्य बागवानी विभाग के निदेशक सतीश शर्मा ने भी माना कि इस बार श्रमिकों की उपलब्धता एक बड़ी चुनौती बनी हुई है। हालांकि उन्होंने स्पष्ट किया कि श्रमिकों की व्यवस्था करना विभाग के अधिकार क्षेत्र में नहीं आता।
झारखंड के मजदूर बन रहे नया सहारा
नेपाल से आने वाले मजदूरों की संख्या घटने के बीच झारखंड के श्रमिक अब कई इलाकों में बागवानों के लिए विकल्प बन रहे हैं। मंडी और कुल्लू जिलों में झारखंड से आए मजदूर काम कर रहे हैं, लेकिन शिमला जैसे प्रमुख सेब उत्पादक क्षेत्रों में उनकी संख्या अभी भी पर्याप्त नहीं है। ऐसे में वहां श्रमिकों का संकट बरकरार है।
आर्थिक कारण माने जा रहे सबसे बड़ी वजह
बागवानी क्षेत्र से जुड़े जानकारों का मानना है कि नेपाली श्रमिकों की कमी के पीछे सबसे बड़ा कारण आर्थिक है। बेहतर आय और रोजगार के नए अवसरों ने उनकी प्राथमिकताएं बदल दी हैं। इसका सीधा असर हिमाचल के सेब उद्योग पर दिखाई देने लगा है, जहां समय पर श्रमिक नहीं मिलने से बागवानों की चिंता लगातार बढ़ रही है।
