हिमाचल के 8 और पारंपरिक उत्पादों को मिला जीआई टैग, अब राज्य के 17 उत्पादों को मिली वैश्विक पहचान
शिमला। हिमाचल प्रदेश के लिए गर्व की खबर है। राज्य के आठ और पारंपरिक उत्पादों को भौगोलिक संकेतक (GI) टैग मिलने से अब इनकी पहचान केवल देश ही नहीं, बल्कि अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भी और मजबूत हो गई है। इससे न केवल इन उत्पादों की मौलिकता सुरक्षित रहेगी, बल्कि किसानों, कारीगरों और ग्रामीण उद्यमियों की आय बढ़ाने का भी रास्ता खुलेगा।
हिमाचल प्रदेश के आठ पारंपरिक उत्पादों को भौगोलिक संकेतक (Geographical Indication-GI) पंजीकरण प्राप्त हो गया है। इनमें स्पीति का सी-बकथॉर्न (छरमा), सलूणी सफेद मक्का, चंबा मेटल आर्ट, सिरमौरी लोइया, किन्नौरी टोपी, मंडी की सेपूबड़ी, किन्नौरी सेब और किन्नौरी आभूषण शामिल हैं। इन नए उत्पादों के जुड़ने के साथ अब हिमाचल प्रदेश के कुल 17 पारंपरिक उत्पाद जीआई टैग प्राप्त कर चुके हैं।
मुख्यमंत्री सुखविंद्र सिंह सुक्खू ने इस उपलब्धि पर प्रदेशवासियों को बधाई देते हुए कहा कि यह राज्य सरकार के पिछले साढ़े तीन वर्षों के निरंतर प्रयासों का परिणाम है। उन्होंने कहा कि जीआई टैग मिलने से इन उत्पादों की मौलिक पहचान सुरक्षित रहेगी और बाजार में इनकी विश्वसनीयता तथा मूल्य में वृद्धि होगी। इससे स्थानीय कारीगरों, किसानों और छोटे उद्यमियों को सीधा लाभ मिलेगा।
मुख्यमंत्री ने कहा कि सरकार चार अन्य पारंपरिक उत्पादों को भी जल्द जीआई टैग दिलाने के लिए सक्रिय रूप से कार्य कर रही है। इनमें चंबा के पांगी क्षेत्र का भोट जौ, चंबा चुख, भरमौर क्षेत्र का प्लेक्ट्रेंथस शहद और सिरमौर का अदरक शामिल हैं। उन्होंने संबंधित अधिकारियों को इन उत्पादों के जीआई पंजीकरण की प्रक्रिया में तेजी लाने के निर्देश दिए हैं।
उल्लेखनीय है कि इससे पहले हिमाचल के कुल्लू शॉल, कांगड़ा चाय, चंबा रुमाल, किन्नौरी शॉल, कांगड़ा पेंटिंग, हिमाचली काला जीरा, हिमाचली चुल्ली तेल, चंबा चप्पल तथा लाहौली बुने हुए मोजे और दस्ताने को जीआई टैग मिल चुका है।
पर्यावरण, विज्ञान, प्रौद्योगिकी एवं जलवायु परिवर्तन विभाग के सचिव सुशील कुमार सिंगला ने बताया कि जीआई पंजीकरण इन उत्पादों को नकली और अनधिकृत उपयोग से कानूनी सुरक्षा प्रदान करता है। इससे इनकी ब्रांड पहचान मजबूत होगी, बाजार में स्वीकार्यता बढ़ेगी और निर्यात की संभावनाओं को भी नया बल मिलेगा।
मुख्यमंत्री ने कहा कि यह उपलब्धि हिमाचल की समृद्ध सांस्कृतिक विरासत और पारंपरिक उत्पादों को वैश्विक पहचान दिलाने की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम है। साथ ही इससे ग्रामीण अर्थव्यवस्था को मजबूती, स्थानीय स्तर पर रोजगार के नए अवसर और उद्यमिता को बढ़ावा मिलेगा।
