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पश्चिम एशिया युद्ध का असर: पश्चिम एशिया तनाव से हिमाचल के MSME सेक्टर पर गहरा असर, दवा उद्योग सबसे ज्यादा प्रभावित
सोलन। पश्चिम एशिया युद्ध का असर अब सीधे हिमाचल प्रदेश के सूक्ष्म, लघु और मध्यम उद्योग (MSME) सेक्टर पर दिखने लगा है। कच्चे माल की कीमतों में बेतहाशा वृद्धि ने खासतौर पर फार्मा इंडस्ट्री की कमर तोड़ दी है। स्थिति इतनी गंभीर हो चुकी है कि कई उद्योग बंद होने की कगार पर पहुंच गए हैं।
कच्चे माल की कीमतों में भारी उछाल
पिछले कुछ दिनों में API (एक्टिव फार्मेसीयूटिकल इंग्रेडिट्स), सॉल्वेंट्स, एक्सिपिएंट्स और पैकेजिंग सामग्री की कीमतों में 200% से 300% तक की बढ़ोतरी दर्ज की गई है।
पैरासिटामोल API: ₹250 से बढ़कर ₹450 प्रति किलो
एल्यूमिनियम, PVC और ग्लास बोतलों के दाम भी तेजी से बढ़े हैं।
इस तेजी ने उत्पादन लागत को कई गुना बढ़ा दिया है, जिससे छोटे और मध्यम उद्योगों के लिए संचालन मुश्किल हो गया है।
दवाओं की कीमतों में बढ़ोतरी तय
जब कच्चा माल महंगा होगा तो दवाएं भी सस्ती नहीं रह पाएंगी। उद्योग विशेषज्ञों का मानना है कि आने वाले समय में आम लोगों को दवाओं के लिए ज्यादा कीमत चुकानी पड़ सकती है।
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उद्योग बंद होने के कगार पर
हिमाचल ड्रग मैन्युफैक्चरर्स एसोसिएशन (HDMA) ने केंद्र सरकार को भेजे ज्ञापन में चेतावनी दी है कि यदि यही हालात रहे तो कई यूनिट्स को मजबूरी में बंद करना पड़ सकता है।
एसोसिएशन के अनुसार, बढ़ती लागत से प्रोडक्शन कॉन्ट्रैक्ट्स घाटे का सौदा बन गए हैं। सरकारी टेंडर पूरे करना मुश्किल हो रहा है। सप्लाई चेन पर गंभीर असर पड़ रहा है।
रोजगार पर मंडराया संकट
उद्योगों के बंद होने की स्थिति में हजारों कामगारों की नौकरी पर खतरा मंडरा रहा है। साथ ही, एलपीजी/एचपीजी की कमी से उत्पादन और घरेलू आपूर्ति भी प्रभावित हो रही है, जिससे मजदूरों का पलायन बढ़ सकता है।
सरकार से की मांग
उद्योग संगठनों ने केंद्र सरकार से तत्काल हस्तक्षेप की मांग की है। जरूरी कच्चे माल की कीमतों पर नियंत्रण हो, ब्लैक मार्केटिंग पर सख्त कार्रवाई और उद्योगों को राहत पैकेज दिया जाए।
क्यों अहम है ये मुद्दा?
हिमाचल का फार्मा सेक्टर देश के दवा उत्पादन में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है। यदि यहां के MSME प्रभावित होते हैं, तो इसका असर राष्ट्रीय स्तर पर दवाओं की उपलब्धता और कीमतों पर पड़ सकता है।
👉 निष्कर्ष:
पश्चिम एशिया का युद्ध भले हजारों किलोमीटर दूर हो, लेकिन उसका असर हिमाचल के उद्योगों और आम लोगों की जेब तक पहुंच चुका है। अगर जल्द समाधान नहीं निकला, तो यह संकट और गहरा सकता है।
