बिलासपुर: डबल टोल और एंट्री टैक्स से ट्रांसपोर्टरों की बढ़ी चिंता, सरकार से राहत की मांग
बिलासपुर। जिले के ट्रांसपोर्टरों ने डबल टोल और एंट्री टैक्स की व्यवस्था को लेकर सरकार से राहत देने की मांग उठाई है। उनका कहना है कि लगातार बढ़ते टैक्स और टोल शुल्क के कारण ढुलाई का खर्च काफी बढ़ गया है, जिससे ट्रांसपोर्ट व्यवसाय से जुड़े लोगों की आर्थिक स्थिति प्रभावित हो रही है।
ट्रांसपोर्टरों के अनुसार वर्ष 1983 से एसीसी सीमेंट बरमाणा से सीमेंट और क्लिंकर की ढुलाई का काम स्थानीय ट्रांसपोर्टर ही कर रहे हैं। इस कार्य से क्षेत्र के सैकड़ों परिवारों की रोजी-रोटी जुड़ी हुई है। लेकिन हाल के वर्षों में टैक्स और टोल की बढ़ती दरों ने इस कारोबार पर अतिरिक्त आर्थिक दबाव डाल दिया है।
बताया गया कि राज्य की सीमा में प्रवेश करने वाले वाहनों से सरकार एंट्री टैक्स वसूलती है। वहीं फोरलेन सड़क बनने के बाद एनएचएआई की ओर से गरामोड़ा और बलोह टोल प्लाजा पर भी टोल वसूली शुरू हो गई है। ऐसे में एक ही ढुलाई के दौरान ट्रांसपोर्टरों को एंट्री टैक्स के साथ-साथ टोल भी देना पड़ रहा है, जिससे उनकी लागत में लगातार इजाफा हो रहा है।
ट्रांसपोर्टरों का कहना है कि एसीसी बरमाणा से निकलने वाली अधिकांश ढुलाई पंजाब मार्ग से होकर गुजरती है। इस कारण कई बार अलग-अलग स्थानों पर टोल देना पड़ता है। अब स्थिति और चुनौतीपूर्ण हो सकती है, क्योंकि राज्य सरकार ने एक अप्रैल 2026 से एंट्री टैक्स बढ़ाने का निर्णय लिया है। ट्रांसपोर्टरों को आशंका है कि इससे उनका आर्थिक बोझ और बढ़ जाएगा।
उन्होंने सिविल सप्लाई के लिए तय परिवहन भाड़े का मुद्दा भी उठाया। ट्रांसपोर्टरों के अनुसार लंबे समय से इन दरों में कोई संशोधन नहीं किया गया है, जबकि डीजल की कीमत, वाहनों के रखरखाव और अन्य परिचालन खर्च लगातार बढ़ते जा रहे हैं। मौजूदा भाड़ा दरें वास्तविक लागत के अनुरूप नहीं हैं, जिससे उन्हें नुकसान झेलना पड़ रहा है।
ट्रांसपोर्ट समुदाय से जुड़े पूर्व अध्यक्ष जीत राम गौतम, अनिल हैप्पी, कमल किशोर, संतोष ठाकुर, जय सिंह, शेर सिंह, कश्मीर सिंह, प्रदीप ठाकुर, राकेश ठाकुर और कुलदीप ठाकुर ने सरकार से मांग की है कि प्रस्तावित एंट्री टैक्स वृद्धि को वापस लिया जाए, डबल टोल व्यवस्था खत्म की जाए और सिविल सप्लाई परिवहन भाड़े की दरों की समीक्षा कर उन्हें वर्तमान बाजार के अनुसार संशोधित किया जाए।
ट्रांसपोर्टरों ने कहा कि यदि उनकी मांगों पर जल्द सकारात्मक फैसला नहीं लिया गया तो वे अपने अधिकारों और आजीविका की सुरक्षा के लिए लोकतांत्रिक तरीके से आंदोलन करने को मजबूर होंगे। उन्होंने स्पष्ट किया कि ऐसी स्थिति में उत्पन्न हालात की जिम्मेदारी सरकार और संबंधित विभागों की होगी।
