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Himachal News: सीबीएसई स्कूलों में टीचर टेस्ट पर हाईकोर्ट सख्त, सरकार से एक हफ्ते में जवाब तलब

by Dainik Janvarta
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हिमाचल: सीबीएसई स्कूलों में पढ़ाने से पहले टेस्ट की शर्त पर मचा विवाद, शिक्षक संगठनों ने उठाए सवाल

शिमला। हिमाचल प्रदेश में सरकारी स्कूलों में लागू किए जा रहे सीबीएसई पैटर्न को लेकर एक नया विवाद खड़ा हो गया है। राज्य सरकार द्वारा 134 सरकारी स्कूलों में सीबीएसई पाठ्यक्रम पढ़ाने वाले शिक्षकों के लिए अनिवार्य स्क्रीनिंग टेस्ट की शर्त तय किए जाने के फैसले को शिक्षकों ने अदालत में चुनौती दी है।

मामला अब हिमाचल प्रदेश उच्च न्यायालय पहुंच चुका है, जहां न्यायमूर्ति विवेक सिंह ठाकुर और न्यायमूर्ति रंजन शर्मा की खंडपीठ ने सरकार को नोटिस जारी कर एक सप्ताह में जवाब मांगा है। इस प्रकरण की अगली सुनवाई 12 मार्च को तय की गई है।

क्यों उठे सवाल?

सरकार का तर्क है कि सीबीएसई से संबद्ध सरकारी स्कूलों में शिक्षा की गुणवत्ता सुनिश्चित करने के लिए योग्य शिक्षकों की स्क्रीनिंग जरूरी है। इसके लिए चयनित शिक्षकों को टेस्ट पास करना होगा।

हालांकि, हिमाचल प्रदेश ज्वाइंट टीचर्स फ्रंट का कहना है कि जो शिक्षक पहले से नियमित भर्ती प्रक्रिया के तहत नियुक्त हैं और वर्षों से सेवाएं दे रहे हैं, उनसे दोबारा परीक्षा लेना उनकी सेवा शर्तों के विपरीत है। संगठन ने संयुक्त याचिका दायर कर सरकार के आदेश पर रोक लगाने की मांग की है।

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शिक्षकों की आपत्ति क्या है?

शिक्षकों का कहना है कि:
वे पहले ही निर्धारित भर्ती प्रक्रिया से चयनित हैं।
वर्षों की सेवा और अनुभव के बावजूद परीक्षा लेना अनुचित है। इससे उनकी पदस्थापना और सेवा स्थिरता प्रभावित हो सकती है।

प्राथमिक स्तर से लेकर वरिष्ठ माध्यमिक विद्यालयों के प्रधानाचार्यों और प्रवक्ताओं तक इस फैसले को लेकर असंतोष देखा जा रहा है।

सरकार की मंशा क्या है?

सरकार का पक्ष यह है कि सीबीएसई पाठ्यक्रम के अनुरूप शिक्षण पद्धति, मूल्यांकन प्रणाली और अकादमिक मानकों को बेहतर ढंग से लागू करने के लिए विशेष योग्यता की आवश्यकता है। स्क्रीनिंग टेस्ट का उद्देश्य योग्य और दक्ष शिक्षकों को ऐसे स्कूलों में तैनात करना है, ताकि छात्रों को गुणवत्तापूर्ण शिक्षा मिल सके।

आगे क्या?

फिलहाल कोर्ट ने सरकार से जवाब दाखिल करने को कहा है। इसके बाद ही यह तय होगा कि आदेश पर अंतरिम रोक लगेगी या नहीं। इस पूरे घटनाक्रम पर शिक्षकों, अभिभावकों और शिक्षा विभाग की नजरें टिकी हुई हैं, क्योंकि यह फैसला भविष्य में सरकारी स्कूलों की कार्यप्रणाली और शिक्षकों की सेवा संरचना को प्रभावित कर सकता है।

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