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अतिक्रमण पर नीति बनाने को लेकर सुप्रीम कोर्ट सख्त, सरकार को कारण बताओ नोटिस जारी
दिल्ली/शिमला। अतिक्रमण मामलों में नीति तैयार करने को लेकर सुप्रीम कोर्ट ने कड़ा रुख अपनाते हुए हिमाचल प्रदेश सरकार को कारण बताओ नोटिस जारी किया है। शीर्ष अदालत ने शिमला जिले के बागी और रतनाड़ी क्षेत्रों में चल रही कार्रवाई तथा अंतरिम आदेशों पर फिलहाल रोक लगा दी है। साथ ही संबंधित मामलों में आगे की किसी भी कार्यवाही पर भी तत्काल प्रभाव से स्थगन लागू कर दिया गया है।
मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत और न्यायमूर्ति जायमाल्य बागची की खंडपीठ ने राज्य सरकार से पूछा है कि अतिक्रमण से जुड़े मामलों में नीति बनाने को लेकर अब तक क्या ठोस कदम उठाए गए हैं। अदालत ने इस मामले में हाईकोर्ट के रजिस्ट्रार जनरल को भी नोटिस जारी किया है।
अगली सुनवाई 6 अप्रैल को
खंडपीठ ने निर्देश दिया कि राज्य सरकार को 16 दिसंबर 2025 के आदेशों के अनुपालन की विस्तृत रिपोर्ट अगली सुनवाई में पेश करनी होगी। अदालत ने स्पष्ट किया कि सरकार बताए कि अतिक्रमण नीति तैयार करने और उससे जुड़े मामलों के समाधान के लिए अब तक क्या कार्रवाई की गई है।
पहले क्या थे सुप्रीम कोर्ट के आदेश
गौरतलब है कि 16 दिसंबर 2025 को शीर्ष अदालत ने प्रदेश सरकार को स्पष्ट निर्देश दिए थे कि अतिक्रमण मामलों के निपटारे के लिए एक स्पष्ट और ठोस नीति बनाई जाए। इसके बावजूद हिमाचल प्रदेश हाईकोर्ट में लंबित एक जनहित याचिका में जिला शिमला के बागी और रतनाड़ी क्षेत्रों से जुड़े मामलों पर कार्रवाई जारी रही।
हाईकोर्ट ने उपायुक्त शिमला और डीएफओ ठियोग को आदेश दिया था कि सभी अतिक्रमणकारियों का विस्तृत ब्यौरा प्रस्तुत किया जाए। रिपोर्ट में नाम, गांव का विवरण, निजी भूमि की स्थिति और वन भूमि पर कब्जे का पूरा रिकॉर्ड शामिल करने के निर्देश दिए गए थे। अदालत ने यह जानकारी 15 फरवरी 2026 तक दाखिल करने को कहा था और मामले की सुनवाई 24 फरवरी के लिए निर्धारित की गई थी।
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एसएलपी के जरिए दी गई चुनौती
बागी क्षेत्र के निवासी विकेश रोहटा सहित अन्य लोगों ने हाईकोर्ट के आदेश को सुप्रीम कोर्ट में विशेष अनुमति याचिका (SLP) के माध्यम से चुनौती दी है। याचिकाकर्ताओं की ओर से पेश अधिवक्ता ने दलील दी कि शीर्ष अदालत के निर्देशों के बावजूद बेदखली और कब्जा हटाने की कार्रवाई न्यायसंगत नहीं है।
वहीं किसान नेता राकेश सिंघा का कहना है कि सुप्रीम कोर्ट के आदेशों के दो महीने बाद भी राज्य सरकार ने अतिक्रमण नीति बनाने की दिशा में कोई ठोस पहल नहीं की है। अब अगली सुनवाई में सरकार को अपना पक्ष और अनुपालन रिपोर्ट स्पष्ट रूप से पेश करनी होगी।
