Home स्वास्थ्य आईजीएमसी शिमला के डॉक्टरों ने मरीज के गले से 8 इंच लंबी जिंदा जोंक निकाली, बिना ऑपरेशन बची जान

आईजीएमसी शिमला के डॉक्टरों ने मरीज के गले से 8 इंच लंबी जिंदा जोंक निकाली, बिना ऑपरेशन बची जान

by Dainik Janvarta
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आईजीएमसी शिमला में अनोखा मामला: मरीज के गले से आठ इंच लंबी जिंदा जोंक सुरक्षित निकाली गई

शिमला। इंदिरा गांधी मेडिकल कॉलेज (आईजीएमसी) शिमला में चिकित्सकों ने एक दुर्लभ और चौंकाने वाला मामला सामने आने पर बड़ी चिकित्सकीय सफलता हासिल की है। सिरमौर जिले के 55 वर्षीय मरीज के गले में फंसी करीब आठ इंच लंबी जिंदा जोंक को डॉक्टरों की टीम ने बिना किसी ऑपरेशन के सुरक्षित बाहर निकाल लिया।

मरीज को सांस लेने में परेशानी और आवाज में बदलाव की शिकायत थी। जांच के दौरान पता चला कि जोंक मरीज की सांस की नली में वोकल कॉर्ड के पास चिपकी हुई थी, जिससे उसकी स्थिति लगातार गंभीर होती जा रही थी। समय रहते उपचार न होने पर यह जोंक खून चूसकर और आकार में बढ़ सकती थी, जिससे मरीज की जान को खतरा हो सकता था।

आईजीएमसी शिमला के ईएनटी विभाग और पल्मोनरी मेडिसिन विभाग के चिकित्सकों ने आपसी परामर्श के बाद तुरंत कार्रवाई करने का फैसला लिया। शुक्रवार को पल्मोनरी मेडिसिन विभाग की टीम ने ब्रोंकोस्कोपी तकनीक का उपयोग करते हुए विशेष फोर्सेप्स की मदद से जिंदा जोंक को बाहर निकाला।

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इस जटिल प्रक्रिया का नेतृत्व सहायक आचार्य एवं कंसलटेंट डॉ. डिंपल के. भगलानी ने किया। उनके साथ सीनियर रेजिडेंट डॉ. राघव निरुला, जूनियर रेजिडेंट डॉ. मयूर बग्गा, डॉ. निशांत और डॉ. कुमार सौरभ के अलावा तकनीकी स्टाफ भी मौजूद रहा। चिकित्सकों की सतर्कता और टीमवर्क के चलते मरीज को बिना चीरा लगाए बड़ी राहत मिली।

मरीज की पहचान सुरेश कुमार निवासी गांव कांगेर धरयार, तहसील पच्छाद, जिला सिरमौर के रूप में हुई है। उन्होंने बताया कि गांव में प्राकृतिक जल स्रोतों से पानी पीते समय जोंक अनजाने में गले के भीतर चली गई होगी। सांस लेने में दिक्कत बढ़ने पर वह पहले सोलन के एमएमयू अस्पताल पहुंचे, जहां जांच के दौरान गले में काले रंग की हिलती हुई वस्तु दिखाई दी। इसके बाद उन्हें आईजीएमसी शिमला रेफर किया गया।

डॉक्टरों ने बताया कि पहाड़ी क्षेत्रों में खुले जल स्रोतों से पानी पीते समय इस तरह की घटनाओं की संभावना रहती है। लोगों को चाहिए कि पानी को उबालकर या फिल्टर करके ही उपयोग करें। सफल उपचार के बाद आवश्यक जांच पूरी कर मरीज को उसी दिन छुट्टी दे दी गई।

आईजीएमसी शिमला के चिकित्सकों की यह उपलब्धि न केवल मरीज के लिए जीवन रक्षक साबित हुई, बल्कि चिकित्सा क्षेत्र में उनकी दक्षता और तत्परता को भी दर्शाती है।

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