हिमाचल प्रदेश: यूरोपीय देशों के सेब पर आयात शुल्क घटने से बागवानों की बढ़ी चिंता
शिमला। हिमाचल प्रदेश के सेब बागवानों की मुश्किलें एक बार फिर बढ़ती नजर आ रही हैं। केंद्र सरकार द्वारा यूरोपीय देशों के सेब पर आयात शुल्क में बड़ी कटौती किए जाने के बाद प्रदेश के फल उत्पादकों में रोष है। हाल ही में यूरोपीय यूनियन (ईयू) के साथ हुए नए व्यापार समझौते के तहत भारत ने सेब के आयात पर लगने वाला शुल्क 50 प्रतिशत से घटाकर 20 प्रतिशत कर दिया है। इस फैसले को हिमाचल की सेब बागवानी के लिए गंभीर झटका माना जा रहा है।
बागवानों का कहना है कि यूरोपीय देशों के सेब पर आयात शुल्क कम होने से विदेशी सेब भारतीय बाजारों में सस्ते दामों पर उपलब्ध होंगे। इससे हिमाचल में उत्पादित सेब की प्रतिस्पर्धा कमजोर पड़ेगी और किसानों को उनकी फसल का उचित मूल्य नहीं मिल पाएगा। इससे पहले न्यूजीलैंड से आने वाले सेब पर भी आयात शुल्क घटाया जा चुका है, जिससे स्थानीय उत्पादक पहले से ही दबाव में हैं।
केंद्र सरकार ने हालांकि स्पष्ट किया है कि यूरोपीय यूनियन से सीमित मात्रा में ही सेब आयात किए जाएंगे। सरकार के अनुसार, शुरुआती तौर पर करीब 50 हजार मीट्रिक टन सेब ही 20 प्रतिशत शुल्क पर भारत आएगा। इसके साथ न्यूनतम आयात मूल्य 80 रुपये प्रति किलो तय किया गया है। अधिकारियों का कहना है कि यूरोपीय देशों के सेब पर आयात शुल्क घटने के बावजूद घरेलू बाजार पर इसका बड़ा असर नहीं पड़ेगा।
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सरकारी आंकड़ों के मुताबिक, भारत में सेब का आयात लगातार बढ़ रहा है। वर्ष 2024 में भारत ने लगभग पांच लाख टन सेब आयात किया। इसमें सबसे अधिक सेब ईरान, तुर्की और अफगानिस्तान से आया, जबकि यूरोपीय यूनियन से करीब 56 हजार टन सेब का आयात हुआ। बागवानों को आशंका है कि यूरोपीय देशों के सेब पर आयात शुल्क कम होने के बाद यह मात्रा तेजी से बढ़ सकती है।
हिमाचल प्रदेश के बागवानी मंत्री जगत सिंह नेगी ने इस फैसले को बागवानों के हितों के खिलाफ बताया है। उनका कहना है कि आयात शुल्क में कटौती से प्रदेश की सेब बागवानी को नुकसान पहुंचेगा और इस मुद्दे को केंद्र सरकार के समक्ष दोबारा उठाया जाएगा। वहीं शिक्षा मंत्री रोहित ठाकुर ने भी कहा कि यूरोपीय देशों के सेब पर आयात शुल्क घटाने का निर्णय किसान विरोधी है और इससे स्थानीय उत्पादकों को भारी आर्थिक नुकसान होगा।
हिमाचल प्रदेश फल, फूल एवं सब्जी उत्पादक संघ के अध्यक्ष हरीश चौहान ने केंद्र सरकार पर सवाल उठाते हुए कहा कि जब बागवान आयात शुल्क बढ़ाने की मांग कर रहे थे, तब इसे घटाना पूरी तरह अन्यायपूर्ण है। उनका कहना है कि यूरोपीय देशों के सेब पर आयात शुल्क में कमी ‘वोकल फॉर लोकल’ की सोच के भी खिलाफ है।
कुल मिलाकर, यूरोपीय यूनियन के साथ हुए इस नए समझौते ने हिमाचल के सेब उत्पादकों की चिंता बढ़ा दी है। अब देखना होगा कि सरकार बागवानों के हितों की रक्षा के लिए आगे क्या कदम उठाती है।
